मजदूरों के कोरोना सफ़र कि अनोखी कहानी, इस कविता की ज़ुबानी।।

बस चले जा रहे हैं

इन मुसाफिरों को देख रहे हो तुम,
ये बस चले जा रहे हैं!
पता नहीं किस अज्ञात से सफर में निकले हैं,
ना मंजिल की खबर है,
ना किसी ठिकाने का पता,
अपनी अपनी गठरियाँ बांधे
बस चले जा रहे हैं,
जिंदगी से लड़ने की जद्दोजहत में
इनके हौसले भी अब
टूटते जा रहे हैं,
इन मुसाफिरों को देख रहे हो तुम,
ये बस चले जा रहे हैं!

इस भीषण गर्मी में भी
नंगे पाँव
सारे रास्ते नापने निकले हैं,
जाना कहाँ है,
ये खुद नहीं जानते हैं,
शायद उस ठिकाने की खोज में हैं,
जहाँ इन्हें भी इंसा मानते हैं!
कैमरे इनके चेहरे बार बार दिखा रहे हैं,
“गौर से देखिये इन बेबसों को”
बस यही बता रहे हैं!
कहते हैं हम ही खड़े हैं
तुम्हारी मदद के लिए,
पर खुद के स्वार्थ पर जीने वाले
“देखो गरीब जा रहे हैं”
ये कहकर अपना मतलब निकाल रहे हैं!

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बच्चे भूख से बिलख रहे है,
आज भी बस
पानी से ही पेट भर रहे हैं,
इस महामारी मे पूरा देश
तो एक साथ आ गया है,
पर ये शायद राजनीतिक प्रपंचों
में ही फसे पड़े हैं,
पुलिस वाले ज़ोरों से ज़ोर आजमा रहे हैं,
लोग बीच बचाव मे वीडियो बना रहे हैं,
मजदूर, कमजोर बेबस दिख रहे हैं,
कुछ रो रहें हैं,
कुछ रोने से थक चुके हैं,
कुछ मदद मांग रहे हैं,
कुछ मदद करने वालों से थक चुके हैं,
अब तो बस एक ठिकाने की उम्मीद में
ये चले जा रहे हैं,
बस चले जा रहे हैं!

ये चुनौती का समय है हम सबके लिए,
पर केवल घर पर रहना भी हम
सह नहीं पा रहे हैं,
खुशनसीबी समझो इस मुश्किल की घड़ी में
अपनो के साथ सुरक्षित तो हो,
इन मुसाफिरों को देखो,
जिनके ठिकाने भी उजड़ गये,
अब तो बस किसी तरह मंजिल को पहुंच जाये,
यही चाह रहे हैं,
ऐसे हालात में जब सारे लोग साथ आए हैं,
तो चलो थोड़ा हाथ हम भी बढ़ाते हैं,
छोटा ही सही,एक कदम हम भी बढ़ाते हैं,
ये जंग भी जीतेंगे हम
बस इसे राजनीतिक फसाद और
मजहबी रन्जिशों से दूर रखो,
क्यूँकी
इन मुसाफिरों को देख रहे हो तुम,
ये बस चले जा रहे हैं!


This poem is dedicated to labours by

Rahul Barnwal

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