माता – पिता के निस्वार्थ प्रेम से जुडी, पढ़िए यह सुंदर कविता!

।।धरती पर भगवान के रूप।।

झूले में झूलते देख मुझे, मैंने खुद से ज्यादा किसी और को खुश होते देखा है…
मेरी एक मुस्कान के लिए ,मैंने किसी को अपनी पूरी जान लगाते देखा है….
शौक और सपने कुछ उनके भी थे,
पर मेरी बेवजह की जिद्द के लिए,उन्हें सारे शौक अपने अंदर दबाते देखा है….
मैंने भगवान के एक रूप को मुझसे हारते देखा है…..!!

आज वक़्त अच्छा है तो ज़िन्दगी अच्छी लग रही है,
पर अपने बुरे वक़्त में भी ,मुझे सबसे अच्छा वक़्त दिखाते देखा है…
खुद बिमार होने पर जताया भी नहीं,
और मेरे बिमार होने पर,मैंने किसी को पूरी रात जागते देखा है….

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मुझे दो घंटे पढ़ते देख,
मैंने किसी को पूरे दिन चहकते देखा है…
मुझे पूरी ज़िन्दगी सीखा के,
फोन पर हाथ फेरना उनका, मुझसे सीखते देखा है…
मैंने भगवान के एक रूप को मुझसे हारते देखा है….!!!!

This beautiful poem is written by

Supriya Jha

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