मैं मज़दूर हूँ …

पढ़िए हमारे मजदूर भाई बहनो की दर्द को बयां करती यह कविता

गरीबी को दुर भगाने का..
एक सपना मैं देखता हूं ।।
परिवार मेरा खुश रहे …
इसलिए दिन-रात मेहनत करता हूं ।।
क्या करूं गरीबी से मजबूर  हूं ..
इसीलिए मैं मज़दूर हुं ।।

कार्य हो चहे कैसा भी …
मेहतन को अपना धर्म मान्ता हूं  ।।
छोटे- बड़े का मुझे कैसा मोह …
मज़दूरी मिलने के नाम पर …
कोई भी कार्य मैं करता हूं ।।
इस गरीबी से मजबूर हूं ..
इसीलिए मैं एक मज़दूर हूं ।।

Artwork by Ritu Mandal

  केहते हैं विश्वकर्मा का चहेता हूं ।।
  घर जाने की इस लड़ाई में..
  आज मिलों तक चल रहा मैं अकेला हूं ।।
  गरीबी का ताज चुभता है मुझे..
  उस ताज को हटाने में मैं समर्थ हूं ..
  हां मैं एक मज़दूर हूं ।।

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खाना पानी लेकर इस लाचारी में …
अखबार पे छपता मैं  रोज़ हूं ।।
भीख मंज़ूर नहीं की मैंने ..
पार आज मेरे परिवार की ..
भूख के आगे मैं मजबूर हूं ..
हां मैं वही मज़दूर हूं ।।

Artwork by Ritu Mandal

मत खिंचो मेरी तस्वीरें ..
इस लाचारी मे मैं विनती करता हूं ।।
काम देके देखो मुझे …
चित्रों की मान कैसे बढ़ाता हूं ।।
तुम्हारे परिवार के सपनों से घर को ..
गढ़ने वाला मैं वहि कड़ी हूं ।।‌
तुमरे मेहनत के घर को रूप देने वाला ..
मैं वही मज़दूर हूं ।।

This mesmerizing poem is written by

Jaydeep Bhakat

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