इस भाग दौड़ भरी ज़िंदगी के ठहराव पर एक कविता!

ऐ ज़िंदगी, कुछ तो ठहर

ऐ ज़िंदगी, कुछ तो ठहर……….
कहां तू भागी जा रही है,
ऐसे न हो तू बेसबर,
वह श्मशान क्यों तूझको जाना है,
जहां कौड़ी भर न तेरी कदर,
ऐ ज़िंदगी, कुछ तो ठहर……….

Artwork By Prerna Sharma

देख समग्र संसार रुक गया,
थम गया यह धुमिल शहर,
देख रुक  गयी यह धरा की गति,
रख ले तू भी ज़रा सबर,
ऐ ज़िंदगी, कुछ तो ठहर……….

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इस ओर चलुं मै जब भी,
ले जाती तू मुझे किधर, क्यों मेरी भावनाओं की,
नहीं तझे है तनिक फिकर,
ऐ ज़िंदगी, कुछ तो ठहर……….

Artwork By Ritu Mandal

मन की व्यथा कोई पढ़ न पाता,
न साथ देते स्वयं मेरे अधर,
कुछ तो साझा कर ले मुझसे,
हर पड़ाव की है तुझे खबर,
ऐ ज़िंदगी, कुछ तो ठहर……….

बाकी हैं अनेकों काम अभी,
तय करने है स्वप्न सफर,
कुछ मेरी सुन, कुछ अपनी कह ले,
कर दे मेरे राह सरल,
ऐ ज़िंदगी, कुछ तो ठहर……… 


Life Needs a Rest to Rethink & Calm Itself! This poetry is written by

Prerna Sharma

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