बचपन की अठखेलियों पर आधारित, यह कविता!

” मेरा वो मासूम सा बचपन था

ना साइकिल थी हमरे पास ना घरवाले कार से हमे छोड़ने जाते थे…
बस चार दोस्त थे, जिनसे लड़ते झगड़ते‌ हम स्कूल पहुंच जाते थे।
ना चाहत ब्रांडेड कपड़ों की ना जरूरत रिमोट कंट्रोल कार की…
बस मम्मी की साड़ी पहने और‌ कागज़ की नाव बना के खुश हो जाते।
बातों मे भी हमारी अलग सा लड़कपन था…
वो मेरा मासूम सा बचपन था।

ना डिश टीवी होता था ना ये वीडियो गेम…
हमारा वक़्त तो सुबह-शाम बस भाई से झगड़ने में निकल जाता था।
वो हमारा घर-घर वाला खेल…
वो अपनी बनाई रेल।

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वो पानी मे पत्ते डालकर बनाई हुई सब्ज़ी…
सीढ़ियों को बनाकर छात्र,
बन जाती मैं भी मास्टर जी।
हारते हुए लूडू के पट्टे को पलट दिया करती थी…
या बेजान सी गुड़िया मे मेरी पुरी जान बसा करती थी।
तब “Tom & Jerry” का “Jerry” मेरी दिल की धड़कन हुआ करता था…
क्यूंकि शायद वो मेरा मासूम सा बचपन हुआ करता था।


These beautiful lines are written by

Supriya Jha

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