Hagia Sophia – चर्च,मस्जिद या म्यूजियम ?

गत् शुक्रवार तुर्की हाईकोर्ट ने Hagia Sophia को सन् 1934 में म्यूजियम बनाए जाने के फैसले को गैरकानूनी बताया, तुर्क राष्ट्रपति ने फैसले का स्वागत किया, 24 जुलाई से मस्जिद में नमाज अदा करने का ऐलान किया।

हागिया सोफिया का इतिहास

तुर्की के इस्तानबुल शहर में स्थित इस म्यूजियम को सन् 1985 में UNESCO के द्वारा विश्व धरोहर घोषित किया गया, परंतु, इसका इतिहास लगभग 1500 वर्ष पुराना है। इतिहासकारों का मानना है कि Hagia Sophia को Byzantine साम्राज्य के पहले शासक Constantine प्रथम के द्वारा 325 AD में ग्रीक सभ्यता से जुड़े (Temple Of Pagan) जिसे (Temple Of Wisdom) भी कहा जाता था, के स्थान पर बनाने के निर्देश दिए। इनके नाम पर ही इस्तानबुल का पुराना नाम (Constantinople) पड़ा। 360 AD को (Constantius) ने इसे विशाल ईसाई सभागार के रूप में तैयार करवाया। सन् 404 में राजनीतिक अस्थिरता के कारण इमारत कि निचली मंजिल को जला दिया गया।(Theodosis Second) ने सन् 415 को इसका पुननिर्माण कराया।

Courtesy : The Hindu

‘निका विद्रोह’ में पुन इस इमारत को क्षति पहुंची, सम्राट ( Justinian First) ने इसे ध्वस्त करवाकर नया सभागार बनवाया, सन् 537 को यह तैयार हुआ, साम्राज्य का राजधर्म  ग्रीक ऑर्थोडॉक्स होने के कारण इसे चर्च माना गया। लगभग 900 वर्षों बाद ऑटोमन बादशाह ( सुल्तान महमूद द्वितीय ) ने 21वर्ष की आयु में सन् 1453 को (Constantinople) जित लिया और नाम बदलकर इस्तानबुल रख दिया।

साथ ही मस्जिद में कई परिवर्तन भी किए गए,  मस्जिद के अंदर कुरान कि आयते गढ़वाई गई, पैगंबर मुहम्मद और उनके नवासो और पूर्ववर्त्ती खलीफाओं के नाम लिखें गए,दीवारों पर मक्का के दिशा की तरफ मेहराबे लगाई गई, आसपास ऊंचे मीनार बनवाए गए, गुबंद को सोने से संवारा गया।

यह ऑटोमन सम्राज्य के अंत तक मस्जिद ही रही। सन् 1934 में वर्तमान तुर्की के संस्थापक (मुस्तफा कमाल अतातुर्क) ने इसके विवादास्पद अतीत को देखते हुए इसे म्यूजियम में तब्दील कर दिया। 

Photo Courtesy : TRT World
विश्व की प्रतिक्रिया

तुर्की में हुए इस बदलाव के पक्ष में जहां बहुत से मुस्लिम देश है वहीं विचारों के आधार पर धुरविरोधी रहे रूस और अमरीका भी इसका विरोध कर रहे है,साथ ही ग्रीस जो स्वयं को Byzentine साम्राज्य का उतराधिकारी मानता है और यूरोपियन यूनियन ने इसका विरोध किया है।

पोप फ्रांसिस ने स्वयं को इस फैसले से दुखी बताया है।
( World Council Of Churches ) ने तुर्की से इस फैसले को वापस लेने को कहा है।
(US sect. Of state- Mike Pompeo) ने तुर्की से पूर्वस्थिति बनाए रखने का आग्रह किया है।
UNESCO- ने इसपर चिंता जताई है।
रूसी राजनयिक ने इस फैसले को रूसी जनता के भावनाओं के विरुद्ध बताया।
Courtesy : Times Of India
अर्दोगान उभरती हुई अंतर्राष्ट्रीय शक्ति

जहां एक ओर अर्दोगान का विरोध पश्चिमी देश व चर्च कर रहे है, दूसरी ओर उन्हें इस फैसले के कारण विश्वभर के मुसलमानों का समर्थन प्राप्त हो रहा है, भारत भी इससे अछूता नहीं है मुस्लिम समाज के बड़े वर्ग में अर्दोगान हीरो की तरह उभर रहे हैं और अर्दोगान हमेशा यह कोशिश करते रहे है, की वो मुस्लिम उम्मा में एक बड़े चेहरे के तरह उभरे, और अब वह इसमें कामयाब होते दिख रहे है।

This article is contributed by Vishnu kumar jha

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