झठी ज़िन्दगी का सच्चा आइना पेश करती, कविता

है झूठ की ये ज़िन्दगी

है झूठ की ये ज़िंदगी ,
हां झुठ मैं है जी रहे।
हां कह रहे, सब ठीक है,
मगर, बस कहने को हैं कह रहे।

आस पास भी भीड़ में,
कोई पहचाना सा लगता नहीं ।
एक डर है पकड़े जाने का,
आहट अंजान के आने की है ।
हां कह रहे, सब ठीक है,
मगर, बस कहने को हैं कह रहे।

Courtesy : quotes.pub

हां खोया मैंने बहुत कुछ है,
मगर पाया, फिर भी कुछ नहीं।
गवा दिया वो भरा समुन्दर,
और हासिल एक बूंद भी नहीं।
काली गहरी रातों में,
सब साफ़ और शांत लगता है,
डरावनी दोपहरों के,
चीखों में वो बात नहीं ।
हां कह रहे, सब ठीक है,
मगर, बस कहने को हैं कह रहे।

Courtesy : Saheera Arts

आंखों के आगे आ जाए ,
वो सच तो, नंगा है।
कुछ परत चढ़ी नहीं,
तो अदब बेशुमार सा लगता है।
जो आंखों को बंद कर के देख पाऊं,
तो ये सच भी झूठा सा लगता है।

है झूठ की ये ज़िंदगी ,
हां झुठ मैं है जी रहे।
हां कह रहे, सब ठीक है,
मगर, बस कहने को हैं कह रहे।


This wonderful poem has been written by

Gourav Prasad

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