गुरु तेग बहादुर: जो कश्मीरी पंडितों की रक्षा के लिए शहीद हो गए

विश्व इतिहास में धर्म, मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांतों की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अद्वितीय है।

तलवार से पड़ा नाम ‘तेग’ बहादुर

गुरु तेग बहादुर, गुरु हरगोबिंद के सबसे छोटे संतान थे, जिनका जन्म 1621 में हुआ था, वे एक महान सेनानी थे और साथ ही एक महान विद्वान थे, करतारपुर युद्ध में उनके शौर्य को देख कर उनका नाम त्यागमल से तेग बहादुर रखा गया जिसका अर्थ था “तलवार का स्वामी”, परन्तु इस युद्ध के बाद उन्होंने बाकला में रहना शुरू कर दिया, और 26 साल तक एक संत का जीवन जिया।

गुरु हर कृष्णन ने उन्हें सिखों का 9 वां गुरु बनाया।

औरंगजेब का कट्टर आदेश

जहाँ एक तरफ गुरु तेग़ बहादुर, अपने काल में चारो तरफ शांति का पैगाम फैला रहे थे, वही दूसरी तरफ प्रोफेसर साहिब सिंह ‘जीवन वृतांत: श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ में लिखते हैं कि इतिहासकारों के अनुसार, औरंगजेब किसी भी धर्म को अपने से ऊपर नहीं देखना चाहता था।

इस कारण उस वक़्त हिंदुओं और सिखों के जबरन धर्मांतरण हो रहे थे और उनके मंदिरों को तोड़ा जा रहा था, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया जा रहा था और गुरु इन हादसों से बहुत दुखी थे क्योंकि उन्हें ऐसा लग रहा था कि लोगों ने मुग़ल शासन की अनिवार्यता को स्वीकार कर लिया था, इसीलिए उन्होंने गाँव-गाँव का दौरा किया था लोगों को आशा और साहस दी ताकि लोग इसके खिलाफ खड़े हो।

जब गुरु जी की शरण में पहुंचे कश्मीरी पंडित

उस वक्त कश्मीर में बेहद विद्वान पंडित रहते थे. एक तरह से यह कहा जा सकता था कि कश्मीर पंडितों का गढ़ था।
उन दिनों औरंगजेब की तरफ से शेर अफगान खां कश्मीर का सूबेदार हुआ करता था. औरंगजेब के आदेश के अनुसार उसने भी तलवार के दम पर कश्मीरी पंडितों को मुसलमान बनाना शुरू कर दिया ।

इससे पहले कश्मीरी पंडितों ने गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु तेग बहादुर साहिब जी के बारे में यह बातें सुन रखी थीं कि वह लोगों की मदद करते हैं और उन्हें आत्मनिर्भर बनाते हैं।
इसलिए उन्होंने सोचा कि क्यों न मुगलों के आगे अपना सिर झुकाने से बेहतर वह गुरु तेग बहादुर साहिब जी से जाकर मिलें।ऐसे में कुछ विद्वान पंडितों का समूह गुरु जी से मिलने के लिए आनंदपुर साहिब पहुंचा और इस समस्या पर गुरु जी के साथ संवाद किया।

गुरु तेग बहादुर जी का औरंगजेब को जवाब

जब कश्मीरी पंडित गुरु जी को अपनी पीड़ा सुना रहे थे, तो गुरु तेग बहादुर साहिब ने कहा कि कमजोरों में जान और दिलेरी डालने के लिए और इस धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए, ये जरुरी है की कोई पवित्र व्यक्ति अपना जीवन की क़ुरबानी दे तभी लोगो में हिम्मत आएगी।

इतिहासकारो और पवित्र ग्रंथो की माने तो कहा जाता है की गुरु गोविन्द सिंह जी की उम्र उस वक़्त केवल 9 वर्ष की थी, लेकिन उन्होंने ने अपना पिता को कहा की पिताजी आपसे पवित्र और ज्ञानी व्यक्ति कौन होगा इस कार्य के लिए और शायद तेग़ बहादुर जी भी यही सोच रहे थे, उनके बेटे के विचारो ने उनमे आशा की एक और उम्मीद जगा दी।
इस बात को सुनकर वहां मौजूद कश्मीरी पंडितों और अन्य लोगों ने कहा कि अगर आपके पिता जी बलिदान दे देंगे तो आप यतीम हो जाएंगे और आपकी मां विधवा हो जाएंगी।
बालक गोबिंद सिंह जी ने कहा कि अगर मेरे अकेले के यतीम होने से लाखों लोग यतीम होने से बच सकते हैं और अकेले मेरी मां के विधवा होने से लाखों मां विधवा होने से बच सकती हैं, तो मुझे यह स्वीकार है।

यह सुन कर गुरु तेग बहादुर ने पंडितों से कहा कि जाकर औरंगजेब से कह दो, अगर तुमने हमारे गुरु का धर्म बदल दिया, और अगर उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिए तो हम भी कर लेंगे, और इस जवाब को औरंगजेब तक पहुंचा दिया गया और उसने इस बात को स्वीकार कर लिया।

गुरु तेग बहादुर साहिब की गिरफ्तारी

कश्मीरी पंडितों की बात सुनने के बाद गुरु जी अपने 4 खास सेवक भाई मती दास, भाई दयाला, भाई सती दास और भाई जैता जी के साथ आनंदपुर साहिब से चल पड़े।
गुरु तेग बहादुर साहिब के निडर औरगंजेब के पास आने और लोगों की मदद करने की बात से औरंगजेब विचलित हो उठा, और उसने गुरु तेग बहादुर और उनके साथियों को तुरंत गिरफ्तार करने का फरमान जारी कर दिया।

औरंगजेब के आदेश पर पांचों सिखों सहित गुरु जी को कैद कर दिल्ली लाया गया. औरंगजेब के हाकमों ने गुरु तेग बहादुर साहिब को मुसलमान बनाने के लिए कई तरह के लालच दिए और भयानक मौत देने की बात कहकर डराने की कोशिश की, बावजूद इसके गुरु तेग बहादुर साहिब जी के दिमाग में केवल एक ही बात थी कि अपना शीश कलम करके कश्मीरी पंडितों को बचाया जाए और कमजोर लोगों में हिम्मत भरी जाए।

गुरु तेग़ बहादुर के अमर होने की दास्तान

गुरु जी को डराने के लिए पहले उनके सामने भाई मतिदास जी को जिंदा आरे से चीर दिया गया, उसके बाद भाई दयाला को उबलते पानी में फेक दिया गया, और आखिर में भाई सती दास जी की ज़िंदा जला दिया गया।

इस जुल्म के बाद भी गुरु जी घबराए नहीं और अंत में गुरु जी को चांदनी चौक में तलवार से शहीद कर दिया गया।

आज इसी जगह पर गुरुद्वारा शीशगंज साहिब मौजूद है।

औरंगजेब का आदेश था कि इनका अंतिम संस्कार न किया जाए. हालांकि सिपाहियों की आंख में धूल झोंककर भाई जैता जी उनके शीश को उठाकर घोड़े पर सवार होकर आनंदपुर साहिब की ओर चल पड़े।

गुरु जी का शीश गायब हुआ देख सिपाहियों ने उनके धड़ के पास पहरा लगा लिया।
ऐसे में लक्खी नाम के एक व्यापारी ने गुरु जी के धड़ को उठाया और अपने गांव रकाबगंज ले गया।

वहां ले जाने पर उसने गुरु जी के धड़ को अपने घर में रखकर पूरे घर को आग लगा दी. इस तरह गुरु जी का अंतिम संस्कार किया गया।

1 thought on “गुरु तेग बहादुर: जो कश्मीरी पंडितों की रक्षा के लिए शहीद हो गए”

  1. Pingback: The Battle of CHAMKAUR: An epic that changed the course of Indian history – Jamshedpur Guru

Leave your comments