Independence Day 2021: देश की आजादी में बिरसा मुंडा का योगदान

Independence day आज के ही दिन हर साल 15 August को मनाई जाती हैं। आज के ही दिन वर्ष 1947 में हमारा देश अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद हुआ था और इस वर्ष हमारा देश 75वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा हैं।


भारत 200 वर्षों से ब्रिटिश शासन का गुलाम था और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के बाद ब्रिटिश राज के शासन से आजाद हो पाया। 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया, फिर भी इसका कोई स्थायी संविधान नहीं था। इसके पश्चात एक समिति गठित की गई, जिसके अध्यक्ष डॉ बी आर अंबेडकर थे। बहुत परिश्रम के बाद आखिरकार संविधान का तैयार किया गया, और 26 जनवरी को भारत को संप्रभु गणराज्य घोषित करने के दिन के रूप में चुना गया और 1950 में एक लोकतांत्रिक सरकार प्रणाली के साथ यह लागू हुआ।

200 वर्षों तक ग़ुलाम रहे, इस देश ने आजादी के लिए काफी संघर्ष किये। देश की आजादी के लिए कई वीरो ने अपनी जान गवाई हैं। देश के कोने कोने से बड़े बड़े वीर जन्में हैं। इन सभी स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे, झारखंड के आदिवासी समाज के नायक भगवान बिरसा मुंडा।

जिन्होंने न केवल झारखंड में बल्कि पूरे देशभर में अपने क्रांतिकारी विचारों से उन्नीसवीं शताब्दी में आदिवासी समाज की दिशा बदल दी। देश की आजादी में भगण बिरसा मुंडा ने अपनी संस्कृति के बचाव से लेकर, अंग्रेज़ो के काले कानूनों को चुनौती दी।

झारखंड ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान झारखंड को स्थानीय लाभ भी हुआ है। कोयला क्षेत्र में हथियार को छुपाना आसान था। पहली स्वतंत्रता संग्राम (1857), झारखंड में पहले ही छिड़ चुकी थी। यहां की जनजातियाँ पहले से ही ब्रिटिश शासन से अपनी भूमि को मुक्त करने के लिए सशस्त्र संघर्ष की एक श्रृंखला में लगी थीं। यहां के झारखंडियों को तिलका मजी (जबरा पहाड़िया), सिद्धू कान्हू, बिरसा मुंडा, काना भगत आदि जैसे दिग्गज आदिवासी नेताओं ने आदिवासी संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। झारखंड में आदिवासी संघर्ष ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा दी। इन सभी नामों में एक नाम था बिरसा मुंडा का। चूंकि झारखंड क्रांतिकारी गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। इसी वक्त देश मे हालात को देखते हुए, बिरसा मुंडा ने आंदोलन की शुरुवात की।

विद्रोह की शुरुआत

वर्ष 1895 में बिरसा आंदोलन का युग शुरू हुआ। इस युग में भगवान बिरसा मुंडा ने लोगों को उनके शक्ति का एहसास कराया। एक दूसरे की धर्म तथा संस्कृति के तौर पर जोड़ने की कोशिश की। इसके बाद सन 1897 से मुंडा समाज तथा अंग्रेजी सिपाहियों के बीच कई युद्ध हुए। बिरसा और उनके चार सौ साथियों ने तीर कमानों से खूंटी थाने पर धावा बोला। जिसके बाद कई आदिवासी नेताओं की गिरफ्तारियां भी हुई। बहुत से बच्चे और औरतें भी मारे गये थे।

उस जगह बिरसा अपनी जनसभा को संबोधित कर रहे थे। दरअसल बिरसा के जेल से आने के बाद अंग्रेजी सरकार ने समझ लिया कि बिरसा उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। बिरसा और उनके साथियों ने कई युद्ध जीते और अंग्रेजो को धूल चटाई।

उलगुलान की शुरुवात

झारखंड में अंग्रेजों के आने से पहले झारखंडियों का राज था लेकिन अंग्रेजी शासन लागू होने के बाद झारखंड के आदिवासियों को अपनी स्वतंत्र और स्वायत्ता पर खतरा महसूस होने लगा। ब्रिटिश सत्ता कानूनों की आड़ में आदिवासियों का शोषण कर रही थी।
अंग्रेजों ने जब आदिवासियों से उनके जल, जंगल, जमीन को छीनने की कोशिश की तो उलगुलान यानी आंदोलन हुआ। बिरसा मुंडा ने ‘अंग्रेजों अपनो देश वापस जाओ’ का नारा देकर उलगुलान का नेतृत्व किया। अपने अस्मिता को बचाये तथा बनाये रखने के लिए बिरसा मुंडा ने उलगुलान की शुरुवात की।

उलगुलान विद्रोह के 3 मुद्दे थे।
पहला, वह जल, जंगल, जमीन जैसे संसाधनो की रक्षा करना चाहते थे।
दूसरा, नारी की रक्षा और सुरक्षा तथा तीसरा, वे अपने समाज की संस्कृति की मर्यादा को बनाये रखना चाहते थे।

इस आंदोलन के पश्चात उन्हें दो साल की जेल हुई। परंतु 2 साल बाद जब वे बाहर आये तो उन्हें यह महसूस हो गया था कि यह आंदोलन और भी उग्र हो चुका है। इसी को देखते हुए उन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए देशवासियों के भीतर और भी जोश भर दिए थे।

ईसाई मिशनरियों से आदिवासियों को बचाया

बचपन से ही बिरसा मुंडा ईसाई मिशनरियों से घिरे रहते थे। था। जिसके बाद मिशनरी स्कूल में भाग लिया, जहाँ उनके शिक्षक जयपाल नाग ने उन्हें जर्मन मिशन स्कूल में दाखिला लेने के लिए प्रोत्साहित किया। प्रवेश पाने के लिए उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया।

जल्द ही उन्होंने महसूस किया कि ब्रिटिश लोग उन्हें उपनिवेश बनाने के लिए वहाँ थे और मिशनरी आदिवासियों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने की कोशिश कर रहे थे। उन्हें ये समझ आ चुका था कि ब्रिटिश आदिवासी समाज को अंधविश्वासों तथा आस्था के मामले में भटका हुआ समझ रहे थें। परंतु अब बिरसा जान चुके थे कि आदिवासी समाज में शिक्षा का अभाव है, गरीबी है, अंधविश्वास है। धर्म के बिंदु पर आदिवासी किसी भी मिशनरियों के प्रलोभन में आ जाते थे। उन्होंने जर्मन मिशन स्कूल से बाहर कर दिया, धर्म त्याग दिया और अपने पारंपरिक विश्वास में लौट आए।

देश के स्वतंत्रता से लेकर आदिवासियों की अस्मिता बचाने तक भगवान बिरसा मुंडा ने काफी संघर्ष किया। आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ तथा पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में बिरसा मुण्डा को भगवान की तरह पूजा जाता है। भारत के इतिहास सदैव इन्हें वीर भगत सिंह, खुदीराम बोस, सुभाष चंद्रबोस की तरह ही देश के स्वतंत्रता में बढ़ चढ़ कर भाग लेने वाले सेनानी की रूप में याद रखेगा।

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